आरबीआई ने नए बैंकिंग लाइसेंस जारी करने के लिए अंतिम गाइडलाइंस जारी कर दी हैं। नए नियमों के तहत सभी निजी और सरकारी कंपनियां, कॉरपोरेट ग्रुप और एनबीएफसी बैंक लाइसेंस के लिए आवेदन दे सकती हैं। 1 जुलाई तक बैंकिंग लाइसेंस के लिए अर्जी दी जा सकती है।
नए नियमों के मुताबिक लाइसेंस लेने वाली कंपनी को कम से कम 10 साल का अनुभव होना चाहिए। कंपनियों का ट्रैक रिकॉर्ड साफ होना चाहिए। इसकी जांच के लिए आरबीआई दूसरे रेगुलेटर और एजेंसियों से मदद लेगा।
कंपनियां नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी के जरिए बैंक बना पाएंगे। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी ग्रुप के बैंक और बाकी फाइनेंशियल सर्विसेज की होल्डिंग कंपनी रहेगी।
नए बैंकों के पास 5 अरब रुपये का पेड-अप वोटिंग इक्विटी कैपिटल होना अनिवार्य है। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी के पास बैंक के पेड-अप वोटिंग इक्विटी कैपिटल का कम से कम 40 फीसदी हिस्सा होगा, जिसपर 5 साल का लॉन-इन पीरियड होगा। 12 साल में इसे 15 फीसदी तक घटाया जाएगा।
नए बैंकों को कारोबार शुरू करने के 3 सालों में शेयर बाजार पर लिस्ट कराना जरूरी होगा। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी को आरबीआई के पास एनबीएफसी के तौर पर रजिस्टर कराना होगा और आरबीआई इनके लिए अलग से नियम बनाएगा।
आरबीआई ने नए बैंकों में विदेशी निवेश को इजाजत दी है। हालांकि, पहले 5 साल तक नए बैंकों में 49 फीसदी से ज्यादा विदेशी निवेश नहीं हो सकता है। इसके बाद उस समय की नीति के मुताबिक विदेशी निवेश की सीमा तय होगी।
नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी के बोर्ड में कम से कम 50 फीसदी स्वतंत्र डायरेक्ट होना जरूरी है। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी प्रमोटर ग्रुप की कंपनियों में निवेश नहीं कर सकती है और ना ही उन्हें कर्ज दे सकती हैं।
नए बैंकों को कम से कम 25 फीसदी शाखाएं ग्रामीण इलाकों में शुरू करनी होंगी, जहां अब तक बैंकिंग सेवाएं नहीं पहुंची हैं। नए बैंकों पर भी मौजूदा प्राइऑरिटी सेक्टर लेंडिंग के नियम लागू होंगे। पेड-अप वोटिंग इक्विटी कैपिटल को 10 अरब रुपये से ज्यादा करने के लिए आरबीआई से पहले इजाजत लेनी होगी।
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नए नियमों के मुताबिक लाइसेंस लेने वाली कंपनी को कम से कम 10 साल का अनुभव होना चाहिए। कंपनियों का ट्रैक रिकॉर्ड साफ होना चाहिए। इसकी जांच के लिए आरबीआई दूसरे रेगुलेटर और एजेंसियों से मदद लेगा।
कंपनियां नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी के जरिए बैंक बना पाएंगे। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी ग्रुप के बैंक और बाकी फाइनेंशियल सर्विसेज की होल्डिंग कंपनी रहेगी।
नए बैंकों के पास 5 अरब रुपये का पेड-अप वोटिंग इक्विटी कैपिटल होना अनिवार्य है। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी के पास बैंक के पेड-अप वोटिंग इक्विटी कैपिटल का कम से कम 40 फीसदी हिस्सा होगा, जिसपर 5 साल का लॉन-इन पीरियड होगा। 12 साल में इसे 15 फीसदी तक घटाया जाएगा।
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आरबीआई ने नए बैंकों में विदेशी निवेश को इजाजत दी है। हालांकि, पहले 5 साल तक नए बैंकों में 49 फीसदी से ज्यादा विदेशी निवेश नहीं हो सकता है। इसके बाद उस समय की नीति के मुताबिक विदेशी निवेश की सीमा तय होगी।
नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी के बोर्ड में कम से कम 50 फीसदी स्वतंत्र डायरेक्ट होना जरूरी है। नॉन-ऑपरेटिव फाइनेंशियल होल्डिंग कंपनी प्रमोटर ग्रुप की कंपनियों में निवेश नहीं कर सकती है और ना ही उन्हें कर्ज दे सकती हैं।
नए बैंकों को कम से कम 25 फीसदी शाखाएं ग्रामीण इलाकों में शुरू करनी होंगी, जहां अब तक बैंकिंग सेवाएं नहीं पहुंची हैं। नए बैंकों पर भी मौजूदा प्राइऑरिटी सेक्टर लेंडिंग के नियम लागू होंगे। पेड-अप वोटिंग इक्विटी कैपिटल को 10 अरब रुपये से ज्यादा करने के लिए आरबीआई से पहले इजाजत लेनी होगी।
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