सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद इस बार भी गर्मी के दिनों में बिजली की किल्लत झेलनी पड़ सकती है। कोयले की कमी और डिमांड-सप्लाई में भारी अंतर इन कोशिशों पर पानी फेर सकता है। हालांकि इससे निपटने के लिए राज्यों के बिजली बोर्ड ने पिछले साल के मुकाबले ज्यादा बिजली खरीदने के सौदे किए हैं।
अभी का मौसम भले ही आपको सुहाना लग रहा हो, लेकिन जल्द ही तपती गर्मी आपकी परेशानी बढ़ाने वाली है क्योंकि इस बार बिजली की किल्लत भी ज्यादा हो सकती है। हालांकि इससे निपटने के लिए राज्यों की बिजली कंपनियां अभी से तैयारियों में जुट गई हैं। मिसाल के तौर पर दिल्ली में बिजली बेचने वाली कंपनी टाटा पावर ने गर्मी की भारी खपत को देखते हुए एनटीपीसी, एनएचपीसी और डीवीसी जैसी बिजली बनाने वाली कंपनियों से अतिरिक्त बिजली खरीदने के लिए सौदे किए हैं।
साल 2012 में दिल्ली में पीक सीजन में जुलाई के महीने में सबसे ज्यादा मांग 5,642 मेगावॉट रही, वहीं इस साल अनुमान है कि बिजली की मांग 6,500 मेगावॉट तक पहुंच सकती है।
बिजली की बढ़ती किल्लत के चलते राज्य सरकारें अपने स्तर पर इस समस्या का समाधान करने में जुटी हैं। हालांकि बिजली उत्पादन करने वाली कंपनियां जरुरत के मुताबिक बिजली का उत्पादन कर पाएंगी इसमें शक है क्योंकि देश के ज्यादातर पॉवर प्लांट कोयले की कमी झेल रहे हैं।
अभी की हालत देखें तो ज्यादातर पावर प्लांट में सिर्फ 4 दिनों का कोयला है। देश में सालाना कोयले की कमी 4.5 करोड़ टन के करीब है। देश में आम तौर पर जून-जुलाई के दिनों में पीक आवर में डिमांड 1,28,000 मेगावॉट के करीब रहती है, जबकि सप्लाई सिर्फ 1,15,000 मेगावॉट के करीब हो पाती है। डिमांड-सप्लाई में ये अंतर इस साल 7-10 फीसदी और बढ़ सकता है।
उत्तरी भारत की बात करें तो दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर सभी राज्यों को बिजली किल्लत का सामना करना पड़ेगा। आंकड़ों के मुताबिक पंजाब में जहां गर्मियों के दौरान डिमांड 5900 मेगावॉट रहती है वहीं सप्लाई 3500 मेगावॉट के करीब होती है। हरियाणा में गर्मियों के दौरान बिजली की खपत 4500 मेगावॉट है जबकि सप्लाई 2000 मेगावॉट रहती है। उत्तर प्रदेश में बिजली की खपत सबसे ज्यादा 9000 मेगावॉट रहती है जबकि सप्लाई सिर्फ 4000 मेगावॉट। ऐसी ही मिलती-जुलती स्थिति राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में है।
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