सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश का करेंट अकाउंट घाटा कम नहीं हो पाया है। मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में देश का करेंट अकाउंट घाटा रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। वित वर्ष 2013 की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में देश का करेंट अकाउंट घाटा बढ़कर 6.7 फीसदी हो गया है। वहीं वित्त वर्ष 2013 की दूसरी तिमाही में करेंट अकाउंट घाटा 5.4 फीसदी रहा था। वित्त वर्ष 2012 की तीसरी तिमाही में करेंट अकाउंट घाटा 4.4 फीसदी रहा था।
साल दर साल आधार पर तीसरी तिमाही में करेंट अकाउंट घाटा 20.2 अरब डॉलर से बढ़कर 32.6 अरब डॉलर हो गया है। सालाना आधार पर अप्रैल-दिसंबर के दौरान करेंट अकाउंट घाटा 56.5 अरब डॉलर से बढ़कर 71.7 अरब डॉलर हो गया है।
वहीं तीसरी तिमाही में देश का व्यापार घाटा 48.6 अरब डॉलर से बढ़कर 59.6 अरब डॉलर हो गया है। सालाना आधार पर तीसरी तिमाही में देश के मैन्यूफैक्चर्ड उत्पादों का निर्यात 7.6 फीसदी से बढ़कर 8.1 फीसदी रहा। सालाना आधार पर तीसरी तिमाही में देश के मैन्यूफैक्चर्ड उत्पादों का आयात 22.3 फीसदी से घटकर 9.4 फीसदी रहा।
सालाना आधार पर तीसरी तिमाही में देश में एफडीआई निवेश 5 अरब डॉलर से घटकर 2.5 अरब डॉलर रहा। वहीं सालाना आधार पर तीसरी तिमाही में देश से 3.8 अरब डॉलर के मुकाबले 6.3 अरब डॉलर की विदेशी निवेश निकाली गई। सालाना आधार पर सेवा क्षेत्र का आयात -8.9 फीसदी से बढ़कर -10.6 फीसदी रहा। वहीं सेवा क्षेत्र का निर्यात 6.4 फीसदी से घटकर 2 फीसदी रहा।
सालाना आधार पर तीसरी तिमाही में फॉरेक्स डेट इनफ्लो -8.7 अरब डॉलर से बढ़कर 2.7 अरब डॉलर रहा। सालाना आधार पर नेट पोर्टफोलियो इंवेस्टमेंट 1.8 अरब डॉलर से बढ़कर 8.6 अरब डॉलर रहा। तीसरी तिमाही में देश का फॉरेक्स भंडार 80 डॉलर से बढ़ा है।
वित्त मंत्रालय का कहना है कि करेंट अकाउंट घाटे का आंकड़ा ज्यादा है, लेकिन धक्का लगने लायक नहीं है। उम्मीद है कि विदेशी निवेश से करेंट अकाउंट घाटे की भरपाई करने हो पाएगी।
वित्त मंत्रालय के मुताबिक निर्यात में बढ़ोतरी जारी रहने से करेंट अकाउंट घाटे में कमी आएगी। वित्त वर्ष 2013 की तीसरी तिमाही के मुकाबले चौथी तिमाही में करेंट अकाउंट घाटे की स्थिति बेहतर होगी।
साल दर साल आधार पर दिसंबर 2012 में देश का विदेशी कर्ज 345.5 अरब डॉलर से बढ़कर 376.3 अरब डॉलर हो गया है। सालाना आधार पर दिसंबर में देश के कुल जीडीपी के मुकाबले विदेशी कर्ज 19.7 फीसदी से बढ़कर 20.6 फीसदी रहा। लंबी और छोटी अवधि के कर्जों से विदेशी कर्ज का बोझ बढ़ा है। एनआरआई डिपॉजिट और उधारी से लंबी अवधि का कर्ज बढ़ा है।
दिसंबर 2012 के अंत तक देश का लंबी अवधि का कर्ज 284.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। दिसंबर 2012 के अंत तक छोटी अवधि का कर्ज 91.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया है। कुल विदेशी कर्ज के मुकाबले छोटी अवधि के कर्ज का हिस्सा 24.4 फीसदी और लंबी अवधि के कर्ज का हिस्सा 75.6 फीसदी है।
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