देश में चल रही राजनीतिक उठापठक से बाजार अछूता नहीं है और बाजार में गिरावट का दौर शुरु हो गया है। क्या वक्त से पहले चुनाव की स्थिति आ सकती है और बाजार को इसका खराब असर झेलना पड़ सकता है, इस सवाल पर सबकी निगाहें बनी हुई है। जानकारों का मानना है कि अगर राजनीतिक स्थिति नहीं सुधरी तो बाजार पर दबाव और बढ़ जाएगा।
देश की राजनीतिक स्थिति नाजुक हो चुकी है। देश में मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता बहुत बड़ी चिंता का विषय है। राजनीतिक असमंजस की वजह से बाजार पर दबाव देखा जाएगा। अब कॉंग्रेस का ध्यान सरकार बचाने और राजनीतिक मोर्चे पर ज्यादा रहेगा और आर्थिक मोर्चे पर ध्यान कम होगा। इसका बाजार पर नकारात्मक असर देखा जाएगा।
राजनीतिक अनिश्चितता के चलते देश में वक्त से पहले मध्यावधि चुनाव की स्थिति आ सकती है। अगर मध्यावधि चुनाव होते हैं तो ये बाजार के लिए अच्छा रहेगा। बाजार फिर से दायरे में जा सकता है और फिर से डिफेंसिव शेयरों में निवेश करना चाहिए।
निवेशकों को सरकारी बैंकों के बजाए निजी बैंकों में निवेश करना चाहिए। सरकारी बैंकों में समस्याएं बनी रहेंगी। पावर कंपनियों को कोयले की दिक्कत से जूझना पड़ रहा है और उनका उत्पादन कम हो रहा है जिससे बैंकों को परेशानी हो सकती है क्योंकि पावर कंपनियों में बैंको का काफी एक्सपोजर है।
जैसे जैसे बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी निवेशक ब्याज दरों के असर से प्रभावित होने वाले शेयरों में निवेश कम करेंगे और डिफेंसिव शेयर जैसे एफएमसीजी, फार्मा में खरीदारी करेंगे। असमंजस की वजह से बैंक, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में बिकवाली देखी जाएगी। मौजूदा स्थिति को देखते हुए निवेशकों को एफएमसीजी, आईटी, फार्मा सेक्टर और चुनिंदा बैंकों में खरीदारी करनी चाहिए।
विदेशी बाजारों में साइप्रस से जुड़ी चिंताएं खत्म हो चुकी हैं, साइप्रस मुद्दे से बाजार का नुक्सान सीमित रहेगा। हालांकि इटली में राजनीतिक स्थिति यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक बनी रहेगी। वहीं भारत में 2014 के बाद भी राजनीतिक स्थिति अस्थिर बनी रहेगी। लेकिन इसके बावजूद भारतीय बाजार अगले 3-4 सालों के लिए काफी आकर्षक लग रहे हैं।
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देश की राजनीतिक स्थिति नाजुक हो चुकी है। देश में मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता बहुत बड़ी चिंता का विषय है। राजनीतिक असमंजस की वजह से बाजार पर दबाव देखा जाएगा। अब कॉंग्रेस का ध्यान सरकार बचाने और राजनीतिक मोर्चे पर ज्यादा रहेगा और आर्थिक मोर्चे पर ध्यान कम होगा। इसका बाजार पर नकारात्मक असर देखा जाएगा।
राजनीतिक अनिश्चितता के चलते देश में वक्त से पहले मध्यावधि चुनाव की स्थिति आ सकती है। अगर मध्यावधि चुनाव होते हैं तो ये बाजार के लिए अच्छा रहेगा। बाजार फिर से दायरे में जा सकता है और फिर से डिफेंसिव शेयरों में निवेश करना चाहिए।
निवेशकों को सरकारी बैंकों के बजाए निजी बैंकों में निवेश करना चाहिए। सरकारी बैंकों में समस्याएं बनी रहेंगी। पावर कंपनियों को कोयले की दिक्कत से जूझना पड़ रहा है और उनका उत्पादन कम हो रहा है जिससे बैंकों को परेशानी हो सकती है क्योंकि पावर कंपनियों में बैंको का काफी एक्सपोजर है।
जैसे जैसे बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी निवेशक ब्याज दरों के असर से प्रभावित होने वाले शेयरों में निवेश कम करेंगे और डिफेंसिव शेयर जैसे एफएमसीजी, फार्मा में खरीदारी करेंगे। असमंजस की वजह से बैंक, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में बिकवाली देखी जाएगी। मौजूदा स्थिति को देखते हुए निवेशकों को एफएमसीजी, आईटी, फार्मा सेक्टर और चुनिंदा बैंकों में खरीदारी करनी चाहिए।
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